राजस्थान के इस पेड़ को बचाने के लिए 363 लोगों ने दी थी जान - Upyogi Jankari

Thursday, 3 May 2018

राजस्थान के इस पेड़ को बचाने के लिए 363 लोगों ने दी थी जान

साइंस ने ये बात बरसों पहले ही मान ली थी कि पेड़-पौधों में भी जान होती है, लेकिन इस बात को निभाया है राजस्थान के एक गाँव ने। जहां एक विशेष प्रजाति के पेड़ों को कटने से बचाने के लिए 363 लोगों ने अपनी ज़िंदगी दांव पर लगा दी। कौनसा है ये गाँव, कौन हैं ये लोग और क्या है ये पूरी कहानी। लाइक और शेयर करना मत भूलिएगा।
जानिए विशनोई समाज के अनोखे बलिदान की पूरी कहानी
ये बात है सन 1730 के जोधपुर के एक गाँव खेजडली की। यहाँ के रहने वाले विशनोई समाज के लोग खेजड़ी के पेड़ को किसी देवता की तरह पूजते थे। एक दिन वहाँ के राजा ने खेजडली गाँव के हरे पेड़ काटने का आदेश दे दिया। राजा के आदेश पर सेना गाँव में हरे खेजड़ी के पेड़ काटने पहुँच गई। विशनोई समाज ने इस बात का काफी विरोध किया, लेकिन सेना ने एक नहीं सुनी। सेना को रोकने के लिए विशनोई समाज के पुरुष व महिलाएं उन पेड़ों से चिपक कर खड़े हो गए। सेना बेरहमी से कुल्हाड़ी से वार पर वार करती गई लेकिन कोई अपनी जगह से नहीं हिला। उन सभी ने अपनी जान गंवा दी लेकिन पेड़ों को नहीं कटने दिया।

खेजड़ी के लिये किये गये इस बलिदान में 69 महिलाओं व 294 पुरुषों ने अपना सिर कटाया था। उनका बलिदान मनुष्य के प्रकृति प्रेम की अनोखी मिसाल हैं। खेजड़ी के लिए किए गए इस बलिदान का ही प्रभाव है कि आज रेगिस्तान में अनेक ऐसे गांव है जहां लोग हरे पेड़ों को नहीं कटने देते। सारे विश्व में पेड़ों को बचाने का यह अनोखा उदाहरण है। राज्य सरकार द्वारा वर्ष 1982 में खेजड़ी को राज्य वृक्ष घोषित कर दिया।
आइये जानते है खेजड़ी से जुड़ी कुछ रोचक बातें

 गर्मी के महीनों में जब सारी वनस्पति धूप में जल जाती है तब खेजड़ी में मार्च से जुलाई तक फल लगते हैं।
इसका फल सांगरी कहलाता है, जिसकी सब्जी बनाई जाती है।
खेजड़ी के वृक्ष की लकड़ी यज्ञ के लिए पवित्र मानी जाती है।
 इसकी पत्तियों से मिलने वाला सेल्यूलोज और लिग्निन नाइट्रोजन संतुलन बनाता है।
 खेजड़ी के अनेक औषधीय गुण भी हैं। इसकी छाल को खांसी, अस्थमा, बलगम, सर्दी व पेट के कीड़े मारने के लिए उत्तम माना जाता है।
तो कैसी लगी आपको हमारी आज की इंस्पाइरिंग स्टोरी। लाइक और शेयर ज़रूर करें।

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